बच्चा मनुष्य का पिता होता है पर निबंध – Child is The Father Of Man Essay in Hindi

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बच्चा मनुष्य का पिता होता है यह प्रसिद्ध कहावत विलियम वर्ड्सवर्थ की प्रसिद्ध कविता माई हार्ट्स लिप्स अप से ली गई हैं जिसके माध्यम से कवी यह बताना चाहता है की व्यक्ति का जीवन उसके बचपन से ही विकसित होना आरम्भ करता है।  जैसे संस्कार आप बच्चों को बचपन में देते है वैसे ही संस्कार किशोर होने पर या व्यस्क होने पर पनपते है। उनकी इस कविता में उन्होंने यह स्पष्ट किया है  जैसे एक बालक इन्द्र्धांषु के रंगो को बड़ी उत्सुकता से देखता है वैसे ही एक व्यसक भी उतने ही सुंदरता और उत्सकता से इंदरधनुष के रंगो को निहारता है और उसका आंनद लेता है।

बच्चा मनुष्य का पिता होता है पर निबंध – Child is The Father Of Man Essay in 1000 Words Hindi

जैसे एक बालक का यह स्वाभाव है वह प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव कर उसकी प्रशंसा कर सकता है उसका यह संस्कार जीवन पर्यन्त रहता है।  जैसे उगता हुआ सूरज नए दिन के शुरुवात है ठीक उसी प्रकार बचपन मानव जीवन का आधार है।

बचपन में हम जो भी कुछ सीखते , देखते है वही हमारा संस्कार बन जाता है और वैसे ही अपने व्यक्तिगत जीवन में व्यव्हार करते है। एक छोटा बालक एक कच्ची मिटी के सामान होता है जिसे आप जैसा ढालना चाहते है वैसा ढल जाता है।

जैसे एक कुम्हार जब घड़े का निर्माण कर रहा होता है या सुराही या मिट्टी के बर्तन को बनाता है वह अत्यंत ध्यान से उसका  निर्माण करता है क्योकि उसे इस बात का ज्ञान होता है यदि एक बार बर्तन का निर्माण सही से नहीं हुआ तो उसे दुबारा सही करना अत्यंत कठिन होगा और मेरी सारी मेहनत व्यर्थ चली जाएगी।

इसी प्रकार का हमारा बचपन है हम जिस प्रकार के संस्कार लेकर बाह्य जीवन में प्रवेश करते है वैसा ही हमारा व्यवहार बन जाता है और उसके पश्चात् वह संस्कार का रूप भी ले लेता है। इसलिए बचपन को जीवन की आधारशिला भी माना जाता है।  यदि आधार ही मजबूत नहीं होगा तो उसकी नीव ढीली रह जाएगी।

परिवार या घर प्रथम पाठशाला है

कहते है आपका घर आपका प्रथम विधालय है।  एक विद्यालय में तो बालक कुछ घंटे ही रहता है और अध्ययन कार्य पूरा का अपने घर चला जाता है।  परन्तु घर से विद्यालय पहुंचने के सफर में वह अनेक व्यवहार अपने घर में ही सीख चुका  होता है जिसे विद्यालय में आकर मूल्यांकन किया जाता है।

जैसी भाषा , व्यवहार हम आचरण में लाते है वैसे ही विचार बालक अपने व्यवहार में धारण करता है और बड़ा होता है।माता-पिता के साथ- साथ हमारा सम्बन्ध परिवार के अन्य लोगो से भी होता है।  जैसा आचरण करते हुए हम अपने सम्बन्धियों को करते देखते है वैसा ही आचरण करना हम उनके साथ करना या हमसे सम्बंधित अन्य लोगो से करना सीख जाते है।

माता-पिता का कर्तव्य

माता-पिता का यह अहम कर्तव्य है की वे अपने बच्चों में अच्छे संस्कारो को धारण करवाये।  परन्तु इसके साथ यह भी सत्य है की बच्चे वही सीखते है जो वो परिवार में देखते हैं जैसा आचरण करते हुए वो अपने माँ-बाप को देखते हैं वैसा ही व्यवहार वो दूसरों के साथ करते हैं। माता-पिता हमारे प्रथम गुरु होते है।

जिस प्रकार हमारे माता-पिता आचरण  करते है , व्य परिवार के अन्य लोगो से व्यवहार करते है और जिस प्रकार वो बाहर किसी से वार्तालाप करते हैं उसी प्रकार का आचरण हम स्वयं ही सीख जाते है।

जिस प्रकार एक पौधे पेड़ बनता है।  परन्तु यदि आप पौधे को सही प्रकार से सींचोगे नहीं तो उस पर फल भी नहीं लग सकते हैं।  प्रसिद्ध कहावत है “बोये पेड़ बबूल का आम कहा से होय ” इसका अर्थ है आप जैसा व्यवहार जीवन में अपने बच्चों को सेखायोगे वो वैसा ही आचरण व्यवहार में लाएगा।  यदि आप उसके समक्ष बुरा व्यवहार करते हो तो वो अच्छे गुण कहाँ से ग्रहण करेगा।

आस-पास का वातावरण

एक बालक जिस प्रकार के वातावरण में रहता है वैसा आचरण करना भी सीख जाता है।  यदि एक बालक एक स्वस्थ वातावरण में रहता है और एक हसमुख परिवार में अपने जीवन का निर्वाह करता है तो उसमे अनेक गुणों का विकास होता है।

वह बालक सहनशील भी होता है और स्वयं के प्रति आत्मविश्वासी भी होता है और समय और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को समयोजित करना भी जानता है।  वहीं इसके विपरीत यदि कोई बालक एक असभ्य परिवार में जन्म लेता है तो उसका जीवन अत्यंत विध्वंस्ता भरा होता है और वो हमेशा नकरात्मक विचारो में ही लीन रहता है।

गीली मिटी के ढेर सा है बचपन ,

जैसी माटी में ढालो वैसे ढल जाता हूँ।

खुद का कोई वजूद नहीं ,

माटी हूँ माटी में ही मिल जाता हूँ।

मेरी माटी पहचान है मेरी ,

ये दुनियाँ  न तेरी न मेरी।

संस्कारो की है आंख-मिचौली ,

हर शख्स है एक बगिया का माली।

बचपन एक गीली मिटी के सामान होता है जिसे जैसे ढाले ढल जाता है।  इन्सान  का खुद कुछ अस्तित्व नहीं होता , वह जैसे वातावरण में जीवन को व्यतीत कर रहा होता है उसी प्रकार का उसका जीवन और आचरण हो जाता है।

निष्कर्ष

हमारा   शरीर जिन भावनाओं को लेकर पैदा होता है अथार्त जैसे कोई गर्भवती महिला अपने गर्भ धारण के समय जिस प्रकार के  वातावरण और व्यवहार का आचरण करती है वैसे ही संस्कार पैदा होने वाली संतान में अवश्य आते है।  वैसे ही ये शरीर जिस माटी का बनता है अंत में उसी में मिल जाता है। हमें जैसे संस्कार हमारे माता-पिता या हमरे परिवार से प्राप्त होते हैं वैसा ही आचरण करना हम सीख जाते है।

 


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