Ghazal Songs​

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अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको। मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको। ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको। बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी …

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अपनी ग़ज़लों में तेरा हुस्न सुनाऊँ आ जा

अपनी ग़ज़लों में तेरा हुस्न सुनाऊँ आ जा आ ग़म-ए-यार तुझे दिल में बसाऊँ आ जा। बिन किए बात तुझे बात सुनाकर दिल की तेरी आँखों में हया रंग सजाऊँ आ जा। अनछुए होंठ तेरे एक कली से छू कर उसको मफ़हूम नज़ाक़त से मिलाऊँ आ जा। मैंने माना कि तू साक़ी है मैं मैकश …

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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं। वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम …

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जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है

जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है, बंदे के दिल में क्या है अल्लाह जानता है। ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है, पर्दों में क्या छिपा है अल्लाह जानता है। जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता, वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है नेक़ी-बदी को अपने कितना ही तू छिपाए, …

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आपको देख कर देखता रह गया

आपको देख कर देखता रह गया क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया। उनकी आँखों से कैसे छलकने लगा मेरे होठों पे जो माजरा रह गया। ऐसे बिछड़े सभी रात के मोड़ पर आखिरी हमसफ़र रास्ता रह गया। सोच कर आओ कू-ए-तमन्ना है ये जानेमन जो यहाँ रह गया रह गया।

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई जैसे अहसान उतारता है कोई। आईना दिख के तसल्ली हुई हमको इस घर में जानता है कोई। फक गया है सज़र पे फल शायद फिर से पत्थर उछालता है कोई। फिर नज़र में लहू के छींटे हैं तुमको शायद मुग़ालता है कोई। देर से गूँजते हैं सन्नाटे जैसे हमको …

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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक। हम ने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक। ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज …

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करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे

करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे, गज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे। वो ख़ार-ख़ार है शाख-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे। ये लोग तज़किरे करते हैं अपने प्यारों के मैं किससे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे। जो हमसफ़र सरे मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’ अजब नहीं …

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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक। हम ने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक। ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज …

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कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का

कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का। गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का। चश्म-ए-साकी मुझे हर गाम पे याद आती है, रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का। अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे में ये नतीजा हुआ …

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